Chanakya Niti kavya anuvad Chapter 15

Author
20 Dec 2022
featured image
ज्ञान, मोक्ष, जटा, भस्म की, नहीं कभी है उसे जरूरत । कष्ट देखकर किसी जीव का, मन जिनका हो दया की मूरत ।
एक अक्षर उपदेश कभी भी, गुरु से शिष्य यदि ले पाए। न कोई धन इस धारा पर, जिसको दे उऋण हो जाए।
दो विधि निपटें शठ, कांटा से, मुख तोड़ो बल प्रयोग कर । गर बल का अभाव खले तो, रहो दूर इनसे हट तज कर ।
मैला वस्त्र पहनने वाला, गंदे मैले दांतो वाला । अधिक भूख से भोजन वाला, निष्ठुर कर्कश वाणी वाला । सूर्योदय सूर्यास्त में सोता, विष्णु सा ही क्यों गुण । वैभव धन है नाश हो जाता, लक्ष्मी उससे करती दूरी ।
मित्र, सेवक, बंधु व भार्या, तजते जब नर होता निर्धन । धनी होने पर फिर अपनाते, अतः मनुष्य से उत्तम है धन ।
पाप कर्म से धन अर्जित जो, घर में रहता 10 वर्ष तक । वर्ष 11 ज्योंहि आता, मूल्य सहित यह नष्ट हो जाता ।
समर्थवान को अयोग्य वस्तु भी योग्य है होती, योग्य कार्य भी दुर्जन को अयोग्य हो जाए । राहु अमृत पीकर भी मृत्यु को पाए विष पीकर शिवशंकर मृत्युंजय कहलाए ।
ब्राह्मण भोजन पर जो बचता है भोजन, परहित हेतु सहानुभूति मर्म है सच्चा । निर्मल है वह ज्ञान न जिससे पाप है होता, दंभ रहित ही कर्म असल में धर्म है सच्चा ।
कांच सिर पर स्थित क्यों न, मणि भले ही पैर के आगे । क्रय विक्रय की बेला आती, मूल्य मणि का ज्यादा लागे ।
शास्त्र अनंत है, बहुत है विद्या, लघु जीवन का लघु है अवधि । इसमें भी है विघ्न बधाएं, अत: हंस सा गुण अपनाएं। दूध और पानी से जैसे, दूध है पीता पानी तजता । सार सभी का वैसा ही लें, तत्व ज्ञान से ही नर सजता ।
दूर से आए नर को, जन को, राह से थके हुए सज्जन को । घर पर आए मानव जन को, रखता इनको बिन भोजन को । भोजन स्वयं अकेला खाए. ऐसा नर चांडाल कहाए ।
चारों वेद शास्त्र अनेकों भी पढ़ कर के, आत्मा जिनकी न पहचाने बहुजन जैसे । कलछी रहे कड़ाही में दिन-रात हमेशा, नहीं पाक रस स्वाद कभी चखती है वैसे ।
द्विजमयी नौका इस जग में उल्टी रीति से है चलती नम्र को भवसागर पहुंचाए उग्र को नर्क आग में तलती ।
अमृत का घर अमृतमय तन, औषधि नायक, कान्तिमय मन । इन गुणों से युक्त चंद्र भी, निकट रवि के जाता है जभी । अपना तेज नहीं रख पाता, पर घर जाकर लघुता पाता । बिना बुलाए पर घर जाए, इसी तरह नर लघुता पाए ।
कमल के दल में जब भंवरा था, कमलिनी फल रस था पीता । विधि वश वह प्रदेश में जाकर, कटु पुष्प रस पी अब जीता।
अगस्त हो रुष्ट पी गए जनक सागर को, अति क्रोध में भृगु विप्र मारा था लात पति को । मेरी सौत सरस्वती की पूजा और मान हैं देते, तोड़े शिवपूजन हेतु मेरे घर कमल पत्ती को । कहती कमला सुनें नाथ! विप्र मेरे हैं दुश्मन, इनके घर नहीं करूं वास रहे सदा ये निर्धन ।
सब बंधन टूटता न टूटे, बांधे बंधन प्रीत की डोरी । काठ भी छेदने वाला भंवरा, छेदन पाता पंकज पंखुड़ी ।
गज त्यागे रतिक्रीड़ा बूढ़ा हो कर भी, कटने पर भी नहीं सुगंधी तजता चंदन । नहीं मीठापन त्यागे गन्ना पीस कर के भी, दीन भी होकर नहीं शील को तजते सज्जन ।
एक गिरि को धारण कर, कहलाते तुम गिरिधारी । तुम्हें हृदय में धारण कर, नहीं कहलाते हम त्रिपुरारी । कहे गोपियां सुन हे! केशव, भाग्य से नाम सदा चलता है। किया बहुत है पुण्य उसी को, मान और यश भी मिलता है।
Now Chanakay Drishti is available on android with text & audio.

Download Chanakya Drishti App.