Chanakya Niti kavya anuvad Chapter 14

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20 Dec 2022
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तीन रत्न है इस धारा पर, अन्न जल व मधुमय वाणी । शिलाखंड को रत्न मानते, कहलाते जन मूर्ख अनाड़ी ।
आत्मा के अपराध वृक्ष से, पांच फल है फलता तन में । रोग, दरिद्रता, दुख व बंधन, व्यसन वगैरह जन जीवन में।
भार्या, मित्र, धन व धारा, मिलते ए सब बारंबार । किंतु शरीर बहुत दुर्लभ है, इसे न नर पाए हर बार ।
बहुजन निर्बल जन मिलकर नाशे शत्रु प्रबल को, बलशाली नर पर हो अकेला है बेचारा । तृण समूह मिला करके जो छप्पर बनता, निष्फल करता बादल की यह प्रबल धारा ।
जल में तेल नहीं पचता है, दुर्जन में नहीं गुप्त वार्ता | दान सुपात्र स्वयं फैलाए, विज्ञ फैलाता शास्त्र की चर्चा ।
धर्म की चर्चा को सुनने पर, श्मशान में चिता देखकर । रोगी देख जो उपजता, पर यह भाव सदा नहीं रहता । गर यह भाव सदा रह पाए, मानव जन्म धन्य हो जाए । कर्म कुफल मिलने पर पछताए जन जैसा, कर्म के पहले गर सोचे रहता वह वैसा । नहीं समय पछताने का आता जीवन में, गिना जाता पुरुष महापुरुष सज्जन में ।
कर्म कुफल मिलने पर पछताए जन जैसा, कर्म के पहले गर सोचे रहता वह वैसा । नहीं समय पछताने का आता जीवन में, गिना जाता पुरुष महापुरुष सज्जन में ।
तप में दान में और विज्ञान में, नीति कुशलता, शौर्य, विनय में । एक से बढ़कर एक धुरंधर, करे न विस्मय इसे सोच कर ।
दूर न दूरी करती उसको, जो बसता है मन के अंदर । निकट नहीं भी निकट के वासी, गर मन उससे करता अंतर ।
लाभ की इच्छा रखते जिससे, उससे रखो मधुर व्यवहार । मधुर बीन से मोहित करके, करे शिकारी मृग शिकार ।
राजा, अग्नि, गुरु व नारी, अति निकटता विनाशकारी । दूरी इनसे न फलदायक, मध्य अवस्था ये हितकारी ।
अग्नि, जल, सर्प, मूढ़, नारी, राजा, राजा का संबंधी । रखे सावधानी इन सबसे, हरे प्राण शीघ्र ए पाखंडी
उत्तम जीवन है गुणी का, धर्मी जन का जीवन सार्थक । न धर्म से अथवा गुण से, जन का जीवन व्यर्थ निरर्थक ।
केवल एक कर्म से जग को, अपना वश में चाहो करना । रामबाण उपाय समझ लो, पर निंदा से दूर तू रहना ।
अवसर के अनुकूल बोले जो वाक्य हमेशा, अपना ही सामर्थ मुताबिक प्रेम करे जो । जितनी शक्ति उतना क्रोध को करने वाला, दुनिया कहती पंडित गुणी ऐसा जन को ।
एक ही देह भिन्न दृष्टि से, भिन्न रूप में नजर है आता । कुत्ता मांस रूप में देखे, कामी में कामुकता लाता । योगी देखे त्रिया तन को, तन यह शव सा लागे उनको ।
6 बातों को सदा छिपाएं, मैथुन, दोष अपने घर जन को, धर्माचरण, सिद्ध औषधि, अपनी निंदा, कुभोजन को ।
कोयल दिन बिताती मौन होकर के तब तक, मीठी बोली के दिन आते हैं नहीं जब तक । जैसे ही ऋतुराज बसंती रंग में छाए, मनभावन वाणी में श्यामा खुलकर गाए ।
धर्म, धन धान्य व वचन गुरु का, औषध का प्रयोग, समझकर । जो नहीं करता हरे ए जीवन, चलें हमेशा इनसे बच कर ।
तज खल संगति रह साधु संग, पुण्य कार्य कर हे! मानव जन । परब्रह्म को भजति दिन तू, नित्य न जग यह हे! जन के मन ।
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